📍 ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा | DarbhangaNews.in
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में बुधवार को ‘ज्योतिषशास्त्र में पंचांग विचार’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में पंचांग, भारतीय काल-गणना और ज्योतिष की परंपरागत अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने पंचांग को केवल पर्व-त्योहार की तारीख देखने का माध्यम न मानकर तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर समय की गणना करने वाली पारंपरिक प्रणाली के रूप में समझाया।
विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग और डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने की। मुख्य वक्ता के रूप में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के धर्मागम विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राम जीवन मिश्र उपस्थित रहे, जबकि मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
डॉ. राम जीवन मिश्र ने ज्योतिष को ‘काल-विधान का शास्त्र’ बताते हुए कहा कि पंचांग में सूर्य और चंद्रमा के चक्रों के आधार पर समय, ऋतु परिवर्तन, पर्व-त्योहार और ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं से संबंधित पारंपरिक गणनाएं की जाती हैं। वहीं अन्य वक्ताओं ने भारतीय सामाजिक और धार्मिक जीवन में पंचांग की भूमिका तथा संस्कारों और शुभ समय निर्धारण से इसके संबंध पर अपने विचार रखे।
📌 मुख्य बातें
✅ लनामिवि के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई।
✅ विषय था—‘ज्योतिषशास्त्र में पंचांग विचार’।
✅ आयोजन संस्कृत विभाग और डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।
✅ बीएचयू के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. राम जीवन मिश्र मुख्य वक्ता रहे।
✅ मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
✅ सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा के प्रधानाचार्य प्रो. जीवानंद झा विशिष्ट वक्ता रहे।
✅ डॉ. आरएन चौरसिया ने विषय प्रवेश कराया।
✅ वक्ताओं ने पंचांग के पांच प्रमुख अंग—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—पर चर्चा की।
✅ भारतीय काल-गणना, संस्कार, पर्व-त्योहार और मुहूर्त निर्धारण में पंचांग की परंपरागत भूमिका पर मंथन हुआ।
✅ कार्यक्रम की शुरुआत मंगलाचरण से हुई और समापन शांति मंत्र के पाठ के साथ किया गया।
🪐 ‘ज्योतिष काल-विधान का शास्त्र’
मुख्य वक्ता डॉ. राम जीवन मिश्र ने अपने संबोधन में ज्योतिष को काल-विधान से जुड़ा शास्त्र बताया।
उन्होंने पंचांग के पांच प्रमुख अंगों—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में समय की गणना और विभिन्न धार्मिक अवसरों के निर्धारण में इनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
उन्होंने सूर्य और चंद्र चक्रों के समन्वय से पंचांग की गणना किए जाने की पारंपरिक व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला।
उनके अनुसार इसी आधार पर ऋतु परिवर्तन, पर्व-त्योहार और ग्रहण जैसी घटनाओं के समय का निर्धारण किया जाता रहा है।
यह वक्ता द्वारा संगोष्ठी में प्रस्तुत ज्योतिषीय एवं पारंपरिक दृष्टिकोण था।
📅 आखिर पंचांग के पांच अंग क्या हैं?
‘पंचांग’ शब्द का अर्थ ही पांच अंगों से जुड़ा है।
परंपरागत पंचांग में मुख्य रूप से:
- तिथि
- वार
- नक्षत्र
- योग
- करण
का विचार किया जाता है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की पंचांग संबंधी शैक्षणिक सामग्री भी तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण को पंचांग की मूल संरचना से जोड़ती है और सूर्य-चंद्र की स्थितियों को इनके निर्धारण का आधार बताती है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि संगोष्ठी में चर्चा किया गया विषय केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था, बल्कि पारंपरिक भारतीय काल-गणना की संरचना पर भी केंद्रित था।
🗓️ पर्व-त्योहार और मांगलिक कार्यों में पंचांग की भूमिका
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने कहा कि सनातन परंपरा में ज्योतिष और पंचांग का विशेष महत्व है।
उनके अनुसार दिन और समय की जानकारी के साथ मांगलिक कार्यों, पर्व-त्योहारों और शुभ दिवसों के निर्धारण के लिए पंचांग का उपयोग किया जाता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पंचांगों की गणना और परंपराओं में कुछ अंतर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन तिथि, नक्षत्र और अन्य मूल घटक व्यापक रूप से इसके केंद्र में रहते हैं।
🕉️ 16 संस्कारों से भी जोड़ा गया पंचांग
सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा के प्रधानाचार्य प्रो. जीवानंद झा ने पंचांग विचार के व्यावहारिक और शास्त्रीय पक्ष पर चर्चा की।
उन्होंने भारतीय काल-गणना की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में वर्णित 16 प्रमुख संस्कारों के संपादन में पंचांग का महत्वपूर्ण स्थान माना गया है।
जन्म से लेकर विवाह और अन्य धार्मिक संस्कारों तक शुभ तिथि और मुहूर्त चयन की परंपरा लंबे समय से पंचांग से जुड़ी रही है।
🌞 सूर्य और चंद्रमा को बताया काल-गणना का आधार
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने ज्योतिष को अन्य शास्त्रों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया।
उन्होंने कहा कि भारतीय काल-गणना में सूर्य और चंद्रमा की महत्वपूर्ण भूमिका है तथा इसी आधार पर समय और तिथियों की गणना की जाती है।
शैक्षणिक स्तर पर भी पारंपरिक पंचांग की मूल गणना सूर्य और चंद्रमा की खगोलीय स्थितियों से जुड़ी मानी जाती है। IGNOU की अध्ययन सामग्री में भी तिथि को सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंध तथा योग को दोनों की स्थितियों के संयुक्त मान से जोड़कर समझाया गया है।
🎓 डॉ. आरएन चौरसिया ने रखा विषय का आधार
संगोष्ठी में विषय प्रवेश कराते हुए संस्कृत विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आरएन चौरसिया ने भारतीय ज्योतिष में काल-गणना, आकाशीय पिंडों की स्थिति और शुभ-अशुभ समय के निर्धारण के संदर्भ में पंचांग की भूमिका पर चर्चा की।
उन्होंने पंचांग के अध्ययन को भारतीय ज्ञान-परंपरा और मनुष्य के दैनिक जीवन से जोड़ते हुए अपने विचार रखे।
उन्होंने इसे प्रकृति और समय के बीच सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम बताया। यह उनके संगोष्ठी में प्रस्तुत पारंपरिक ज्योतिषीय दृष्टिकोण का हिस्सा था।
👥 ये प्रमुख विद्वान रहे मौजूद
राष्ट्रीय संगोष्ठी में कई शिक्षाविद और शोधार्थी शामिल हुए।
प्रमुख प्रतिभागियों में:
- डॉ. राम जीवन मिश्र — मुख्य वक्ता
- प्रो. पुनीता झा — उद्घाटनकर्ता
- प्रो. जीवानंद झा — विशिष्ट वक्ता
- डॉ. आरएन चौरसिया — विषय प्रवेश
- डॉ. कृष्णकांत झा — अध्यक्ष
- डॉ. शिखर वासिनी
- डॉ. मोना शर्मा
- डॉ. ममता स्नेही
- डॉ. संजीव कुमार शाह
- डॉ. विजय कुमार मिश्र
- डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा
सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
🎙️ मंगलाचरण से शुरुआत, शांति मंत्र से समापन
कार्यक्रम की शुरुआत कुमकुम कुमारी के मंगलाचरण से हुई।
डॉ. मोना शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि जिग्नेश कुमार ने कार्यक्रम का संचालन किया। डॉ. ममता स्नेही ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
आयोजकों की ओर से अतिथियों का मिथिला की परंपरा के अनुसार पाग और चादर देकर सम्मान किया गया।
संगोष्ठी का समापन शांति मंत्र के पाठ के साथ हुआ।
🔬 परंपरा और खगोल-गणना को अलग-अलग समझना भी जरूरी
पंचांग के संदर्भ में दो स्तरों को अलग समझना उपयोगी है।
पहला है खगोलीय गणना, जिसमें सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तिथि, नक्षत्र और अन्य समय-मान निकाले जाते हैं।
दूसरा है इन गणनाओं से जुड़े ज्योतिषीय, धार्मिक या शुभ-अशुभ फलादेश, जो पारंपरिक मान्यताओं और ज्योतिषशास्त्रीय व्याख्याओं का हिस्सा हैं।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने दोनों पहलुओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। जहां खगोलीय स्थितियों की गणना गणितीय आधार रखती है, वहीं शुभ-अशुभ फल, कर्मफल या ज्योतिषीय प्रभाव से जुड़े दावे परंपरागत ज्योतिष के दायरे में आते हैं।
इस अंतर को स्पष्ट रखना पाठकों के लिए जरूरी है।
📊 जरूरी जानकारी एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| कार्यक्रम | राष्ट्रीय संगोष्ठी |
| विषय | ज्योतिषशास्त्र में पंचांग विचार |
| तारीख | 2 सितंबर 2026 |
| स्थान | पीजी संस्कृत विभाग सभागार, LNMU |
| शहर | दरभंगा |
| आयोजक | पीजी संस्कृत विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन |
| अध्यक्षता | डॉ. कृष्णकांत झा |
| मुख्य वक्ता | डॉ. राम जीवन मिश्र |
| उद्घाटनकर्ता | प्रो. पुनीता झा |
| विशिष्ट वक्ता | प्रो. जीवानंद झा |
| विषय प्रवेश | डॉ. आरएन चौरसिया |
| पंचांग के प्रमुख अंग | तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण |
| संचालन | जिग्नेश कुमार |
| स्वागत | डॉ. मोना शर्मा |
| धन्यवाद ज्ञापन | डॉ. ममता स्नेही |
| प्रतिभागी | शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अन्य विद्वान |
🔍 DarbhangaNews.in विश्लेषण
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में आयोजित यह संगोष्ठी इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा में पंचांग और काल-गणना का ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
चाहे विवाह का मुहूर्त हो, पर्व की तिथि हो या अन्य संस्कार—पंचांग आज भी बड़ी संख्या में परिवारों के दैनिक और धार्मिक निर्णयों का हिस्सा है।
लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर इस विषय की चर्चा का महत्व केवल परंपरा दोहराने में नहीं, बल्कि उसे शोध, गणना-पद्धति और आलोचनात्मक अध्ययन के साथ समझने में होना चाहिए।
पंचांग के कई मूल घटक सूर्य और चंद्रमा की खगोलीय स्थितियों पर आधारित गणनाओं से जुड़े हैं। वहीं शुभ-अशुभ फल, कर्मफल और अन्य ज्योतिषीय व्याख्याएं पारंपरिक विश्वास एवं ज्योतिषशास्त्रीय सिद्धांतों के क्षेत्र में आती हैं। दोनों को एक ही प्रकार का वैज्ञानिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा।
इसीलिए ऐसी राष्ट्रीय संगोष्ठियों से आगे का महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विश्वविद्यालय पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धति, खगोलीय गणना, ऐतिहासिक पांडुलिपियों और तुलनात्मक अध्ययन के साथ किस तरह जोड़ता है।
मिथिला की पंचांग परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसकी गणना-पद्धति, इतिहास और वर्तमान उपयोग पर व्यवस्थित अकादमिक शोध किया जाए तो यह विषय नई पीढ़ी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र बन सकता है।








