📍 दरभंगा | DarbhangaNews.in
दरभंगा के महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में रखी दुर्लभ हाथीदांत और लकड़ी की कलाकृतियों के संरक्षण में कथित देरी का मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच गया है। संग्रहालय के पूर्व क्यूरेटर और INTACH की बिहार इकाई के सह-संयोजक शिव कुमार मिश्र ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधान प्रयोगशाला—NRLC, लखनऊ की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
वर्ष 2019 में 155 प्राचीन कलाकृतियों के वैज्ञानिक संरक्षण के लिए संग्रहालय और NRLC के बीच समझौता हुआ था। परियोजना के लिए ₹1.65 करोड़ स्वीकृत किए गए और इसकी आधी राशि यानी ₹82.5 लाख अग्रिम रूप से NRLC को दी गई। निर्धारित तीन वर्षों के मुकाबले करीब सात वर्ष बाद भी बड़ी कलाकृतियों का काम अधूरा बताया जा रहा है।
📌 मुख्य बातें
✅ वर्ष 2019 में 155 कलाकृतियों के संरक्षण का हुआ था समझौता
✅ परियोजना की स्वीकृत राशि ₹1.65 करोड़
✅ NRLC को ₹82.5 लाख अग्रिम भुगतान का दावा
✅ संरक्षण कार्य तीन वर्षों में पूरा करने की शर्त
✅ करीब 100 छोटी वस्तुओं पर काम होने की पूर्व क्यूरेटर की जानकारी
✅ पालकी, हाथी का हौदा और राजसिंहासन जैसी बड़ी वस्तुएं अब भी लंबित
✅ NRLC ने करीब 65 प्रतिशत काम पूरा होने का दावा किया
✅ कर्मचारियों की कमी को देरी का प्रमुख कारण बताया गया
✅ पूर्व क्यूरेटर शिव कुमार मिश्र ने प्रधानमंत्री को भेजा पत्र
✅ केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
🏛️ किस संग्रहालय से जुड़ा है मामला?
यह मामला दरभंगा स्टेशन के पास स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय से जुड़ा है। इसे पास में मौजूद चंद्रधारी संग्रहालय से अलग समझना जरूरी है। दोनों दरभंगा के प्रमुख संग्रहालय हैं, लेकिन विवादित हाथीदांत संग्रह महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में रखा गया है।
संग्रहालय बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग के अधीन संचालित होता है। यहां मौजूद हाथीदांत की कलाकृतियों को देश के सबसे बड़े और विशिष्ट संग्रहों में शामिल बताया गया है। संग्रह की अधिकांश वस्तुएं दरभंगा राज परिवार ने सरकार को दान की थीं।
✉️ प्रधानमंत्री को भेजा गया शिकायत पत्र
पूर्व क्यूरेटर शिव कुमार मिश्र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में आरोप लगाया है कि बार-बार स्मरण पत्र भेजे जाने के बावजूद संरक्षण कार्य दोबारा शुरू नहीं किया गया।
पत्र में प्रधानमंत्री से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को तत्काल कार्रवाई का निर्देश देने तथा कथित लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है। पत्र में आशंका जताई गई है कि लगातार देरी से दुर्लभ कलाकृतियों की स्थिति और खराब हो सकती है।
🤝 वर्ष 2019 में हुआ था समझौता
दरभंगा संग्रहालय और NRLC लखनऊ के बीच वर्ष 2019 में संरक्षण समझौता किया गया था। इसके तहत हाथीदांत, लकड़ी और दूसरी सामग्रियों से बनी 155 प्राचीन वस्तुओं का वैज्ञानिक तरीके से उपचार किया जाना था।
समझौते के अनुसार, पूरी परियोजना को तीन वर्षों में समाप्त किया जाना था। इसके लिए संग्रहालय प्रशासन ने ₹1.65 करोड़ स्वीकृत किए और ₹82.5 लाख अग्रिम भुगतान किया।
वर्ष 2019 की एक अन्य रिपोर्ट में भी संरक्षण समझौते और संग्रहालय के हाथीदांत संग्रह की खराब होती स्थिति का उल्लेख किया गया था। उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर संरक्षण प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने की जानकारी दी गई थी।
🐘 संग्रह में कौन-कौन सी दुर्लभ वस्तुएं?
समझौते में महिषासुरमर्दिनी की हाथीदांत प्रतिमा, हाथी पर रखा जाने वाला हौदा, शाही पालकी, राजसिंहासन, श्रृंगार पेटियां, कुर्सियां, मेज और घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा जैसी वस्तुएं शामिल थीं।
लकड़ी की कलाकृतियों में भगवान बुद्ध के जन्म का दृश्य, मंदिरों की प्रतिकृतियां, शाही सोफा, मगरमच्छ, मछली और कछुए की नक्काशी तथा दरबार हॉल की मेज जैसी वस्तुएं शामिल हैं।
👑 दरभंगा राज की विरासत से जुड़ा संग्रह
रिपोर्ट के अनुसार, महाराजा रामेश्वर सिंह ने वर्ष 1900 से 1929 के बीच मुर्शिदाबाद के शिल्पकारों से बड़ी संख्या में हाथीदांत की कलाकृतियां तैयार कराई थीं।
एक सदी से अधिक पुरानी इन वस्तुओं में कई बेहद बारीक नक्काशी वाली हैं। समय, नमी, धूल, तापमान में बदलाव और सामग्री की स्वाभाविक कमजोरी के कारण उनमें टूटने, पीला पड़ने तथा छोटे हिस्से अलग होने का जोखिम बढ़ता है।
👷 पांच सदस्यीय टीम ने शुरू किया था काम
समझौते के बाद NRLC की पांच सदस्यीय टीम दरभंगा आई थी। पूर्व क्यूरेटर के अनुसार टीम करीब एक वर्ष तक यहां रही और लगभग 100 छोटी कलाकृतियों का संरक्षण किया।
इन वस्तुओं में टूटते हाथीदांत के हिस्सों को स्थिर करना, सतह की सफाई और कमजोर जोड़ को मजबूत करने जैसे काम किए गए। संरक्षित छोटी वस्तुओं को बाद में संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया।
⛔ बड़ी कलाकृतियों पर काम रह गया अधूरा
पूर्व क्यूरेटर का कहना है कि टीम ने छोटी वस्तुओं पर अच्छा काम किया, लेकिन हाथीदांत की पालकी, हाथी का हौदा और बड़े राजसिंहासन जैसी महत्वपूर्ण कलाकृतियों का संरक्षण पूरा नहीं किया गया।
टीम के लखनऊ लौटने के बाद संग्रहालय की ओर से NRLC को कई पत्र भेजे गए, लेकिन कार्य दोबारा शुरू नहीं हुआ। बड़ी वस्तुएं अपने आकार, वजन और नाजुक संरचना के कारण अधिक समय तथा विशेषज्ञ संसाधनों की मांग करती हैं।
📉 समय के साथ बढ़ सकता है नुकसान
हाथीदांत जैविक सामग्री है और वातावरण में नमी तथा तापमान के उतार-चढ़ाव से प्रभावित हो सकता है। उसमें दरार, परत अलग होने, रंग बदलने और नक्काशी के छोटे हिस्से टूटने का खतरा रहता है।
लकड़ी की वस्तुओं में कीट, फफूंद, नमी और संरचनात्मक कमजोरी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए केवल सामान्य सफाई पर्याप्त नहीं होती; प्रत्येक वस्तु की स्थिति का दस्तावेजीकरण और विशेषज्ञ उपचार आवश्यक होता है। संरक्षण विशेषज्ञों ने दरभंगा की कलाकृतियों के लिए नियंत्रित सफाई, खाली स्थान भरने और संरचनात्मक मजबूती की विशेष तकनीक दर्ज की है।
🧪 विशेष वैज्ञानिक पद्धति का हुआ इस्तेमाल
NRLC के वैज्ञानिक संजय प्रसाद गुप्ता और संरक्षण विशेषज्ञ इलियास अहमद ने वर्ष 2024 के एक शोधपत्र में दरभंगा संग्रहालय की हाथीदांत वस्तुओं के संरक्षण की पद्धति का अध्ययन प्रस्तुत किया था।
इस पद्धति में कठोर रसायनों के बजाय नियंत्रित और अपेक्षाकृत पर्यावरण अनुकूल सॉल्वेंट, टूटे हिस्सों को जोड़ने के लिए हटाए जा सकने वाले चिपकाने वाले पदार्थ तथा नमी से बचाते हुए संरचना को मजबूत करने की तकनीक शामिल थी।
🗣️ NRLC ने कर्मचारियों की कमी बताई वजह
NRLC के कला संरक्षण विशेषज्ञ इलियास अहमद ने ThePrint को बताया कि संस्थान गंभीर कर्मचारी संकट का सामना कर रहा है और नियमित नियुक्तियां लंबित हैं।
उनके अनुसार दरभंगा परियोजना का करीब 65 प्रतिशत काम पूरा किया जा चुका है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने और आवश्यक कर्मचारियों की उपलब्धता के बाद एक-दो महीने के भीतर शेष संरक्षण कार्य फिर शुरू किया जा सकता है।
🔢 संरक्षित वस्तुओं की संख्या में अंतर
पूर्व क्यूरेटर ने करीब 100 छोटी वस्तुओं का संरक्षण होने की बात कही है। दूसरी ओर, दिसंबर 2025 में लोकसभा में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से प्रस्तुत विवरण में वर्ष 2021-22 के दौरान दरभंगा के महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में हाथीदांत, चांदी, हड्डी और लकड़ी की कुल 176 वस्तुओं का संरक्षण दर्ज है।
जबकि मूल समझौता 155 प्राचीन वस्तुओं के लिए बताया गया था। इन अलग-अलग आंकड़ों को देखते हुए प्रत्येक कलाकृति की क्रम संख्या, वर्तमान स्थिति और किए गए उपचार का संयुक्त एवं सार्वजनिक सत्यापन आवश्यक दिखाई देता है।
📋 वस्तुवार प्रगति रिपोर्ट क्यों जरूरी?
संग्रहालय और NRLC को संयुक्त रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी वस्तुओं का उपचार पूर्ण हुआ, कितनी आंशिक रूप से संरक्षित हैं और किन वस्तुओं पर काम शुरू नहीं हुआ।
प्रत्येक कलाकृति के लिए पहले और बाद की तस्वीर, संरक्षण की तारीख, इस्तेमाल की गई तकनीक और भविष्य की देखरेख से जुड़ी जानकारी तैयार करने से प्रगति की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
💰 पांच वर्षों में NRLC को मिला ₹28.20 करोड़
लोकसभा में दिए गए सरकारी उत्तर के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22 से 30 नवंबर 2025 तक NRLC के लिए कुल लगभग ₹28.20 करोड़ का बजट आवंटित किया गया। इसी अवधि में करीब ₹24.17 करोड़ खर्च दर्ज किया गया।
यह बजट केवल दरभंगा परियोजना के लिए नहीं, बल्कि NRLC की देशभर में चलने वाली संरक्षण, शोध, प्रशिक्षण और संग्रहालय सहायता गतिविधियों के लिए था। इसलिए दरभंगा के लिए दी गई ₹82.5 लाख अग्रिम राशि की अलग परियोजनागत उपयोग रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।
📑 मंत्रालय के रिकॉर्ड में संरक्षण कार्य का उल्लेख
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की गतिविधियों से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड में दरभंगा संग्रहालय की हाथीदांत, लकड़ी, चांदी और हड्डी से बनी वस्तुओं के संरक्षण को NRLC की परियोजनाओं में शामिल किया गया है।
ThePrint की रिपोर्ट के अनुसार मंत्रालय की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में भी महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय की हाथीदांत जड़ाई, लकड़ी और धातु की वस्तुओं के संरक्षण का उल्लेख किया गया। इसके बावजूद संग्रहालय पक्ष का कहना है कि बड़ी और महत्वपूर्ण वस्तुओं का काम अब भी अधूरा है।
🧾 अग्रिम राशि का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग
₹82.5 लाख के अग्रिम भुगतान के बाद कितना कार्य किया गया, कितनी राशि खर्च हुई और शेष धनराशि की स्थिति क्या है, इससे संबंधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।
पारदर्शिता के लिए भुगतान, कर्मचारियों की तैनाती, यात्रा, सामग्री, वैज्ञानिक परीक्षण और वस्तुवार संरक्षण लागत का ऑडिट उपयोगी हो सकता है।
🧑💼 पूर्व क्यूरेटर ने उठाया प्रशासनिक संकट का मुद्दा
शिव कुमार मिश्र ने NRLC में स्थायी नेतृत्व और कर्मचारियों की कमी का मुद्दा भी उठाया है। उन्होंने दावा किया कि संस्थान लंबे समय से नियमित महानिदेशक की अनुपस्थिति और प्रशासनिक कमजोरी का सामना कर रहा है।
NRLC की ओर से कर्मचारियों की कमी स्वीकार की गई है, लेकिन नियुक्तियों की विस्तृत समयसीमा या दरभंगा भेजी जाने वाली नई विशेषज्ञ टीम की तारीख सार्वजनिक नहीं की गई है।
👀 वर्ष 2017 में नीतीश कुमार ने देखा था संग्रह
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2017 में दरभंगा के चंद्रधारी और महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय का दौरा किया था। उस दौरान उन्हें हाथीदांत संग्रह की स्थिति और वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता की जानकारी दी गई थी।
इसके बाद अधिकारियों को संरक्षण कार्य तेजी और सावधानी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था।
🏺 केवल प्रदर्शनी नहीं, दस्तावेजीकरण भी जरूरी
दुर्लभ कलाकृतियों को सुरक्षित रखने के लिए नियंत्रित तापमान और आर्द्रता, नियमित कीट निगरानी, उपयुक्त रोशनी और सुरक्षित डिस्प्ले केस की आवश्यकता होती है।
इसके साथ प्रत्येक वस्तु की उच्च गुणवत्ता वाली डिजिटल तस्वीर, त्रिआयामी स्कैन और विस्तृत कैटलॉग तैयार करना जरूरी है। किसी भौतिक वस्तु को भविष्य में नुकसान पहुंचने की स्थिति में डिजिटल रिकॉर्ड शोध और पुनर्स्थापन में मदद कर सकता है।
🌡️ संग्रहालय में पर्यावरण निगरानी की जरूरत
हाथीदांत और लकड़ी की वस्तुओं को सामान्य कमरे के तापमान में बिना निगरानी के लंबे समय तक प्रदर्शित करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
संग्रहालय में तापमान और आर्द्रता रिकॉर्ड करने वाले उपकरण, धूल नियंत्रण, कीट प्रबंधन और आपातकालीन संरक्षण योजना होनी चाहिए। बड़ी पालकी तथा राजसिंहासन जैसी वस्तुओं के लिए विशेष माइक्रो-क्लाइमेट डिस्प्ले विकसित किए जा सकते हैं।
🚫 हाथीदांत संरक्षण का अर्थ व्यापार नहीं
संग्रहालय में रखी ऐतिहासिक हाथीदांत वस्तुओं का वैज्ञानिक संरक्षण वन्यजीव उत्पादों के नए व्यापार या निर्माण से अलग विषय है।
इन वस्तुओं को सांस्कृतिक इतिहास के प्रमाण के रूप में संरक्षित किया जाता है। संरक्षण के दौरान नई हाथीदांत सामग्री जोड़ने के बजाय उपलब्ध मूल हिस्सों को सुरक्षित रखने और आवश्यकतानुसार उपयुक्त वैकल्पिक सामग्री इस्तेमाल करने पर जोर दिया जाता है।
🏛️ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मामला
यह संग्रह केवल दरभंगा राज परिवार की शाही जीवनशैली का प्रमाण नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद और मिथिला से जुड़े शिल्प, संरक्षण तकनीक और उस समय की कलात्मक परंपराओं का दस्तावेज भी है।
इन वस्तुओं के अध्ययन से इतिहासकारों को शाही संरक्षण, अंतरक्षेत्रीय शिल्प संबंधों और बीसवीं सदी की शुरुआत की सजावटी कला को समझने में सहायता मिल सकती है।
🔮 आगे क्या होगा?
प्रधानमंत्री कार्यालय या केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की ओर से पत्र पर किसी कार्रवाई की सार्वजनिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
NRLC ने कर्मचारियों की उपलब्धता के बाद काम फिर शुरू होने की उम्मीद जताई है। अब यह देखना होगा कि नई टीम दरभंगा कब पहुंचती है और पहले चरण में पालकी, हौदा तथा राजसिंहासन में से किन वस्तुओं पर काम शुरू किया जाता है।
संग्रहालय प्रशासन, बिहार सरकार और NRLC के बीच नई समयसीमा तय होने पर ही परियोजना के पूर्ण होने की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
📊 जरूरी जानकारी एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| 🏛️ संग्रहालय | महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय |
| 📍 स्थान | दरभंगा, बिहार |
| 🐘 प्रमुख संग्रह | हाथीदांत, लकड़ी, चांदी और अन्य दुर्लभ वस्तुएं |
| 🤝 समझौता | वर्ष 2019 |
| 🏢 संरक्षण एजेंसी | NRLC, लखनऊ |
| 🗂️ समझौते में वस्तुएं | 155 |
| 💰 स्वीकृत राशि | ₹1.65 करोड़ |
| 💵 अग्रिम भुगतान | ₹82.5 लाख |
| ⏳ निर्धारित अवधि | तीन वर्ष |
| 📅 वर्तमान देरी | करीब सात वर्ष |
| 🧰 पूर्व क्यूरेटर का दावा | लगभग 100 छोटी वस्तुओं का संरक्षण |
| 📈 NRLC का दावा | करीब 65% काम पूरा |
| 📑 सरकारी संसदीय रिकॉर्ड | 176 वस्तुओं का संरक्षण दर्ज |
| ⚠️ प्रमुख लंबित वस्तुएं | शाही पालकी, हौदा और राजसिंहासन |
| ✉️ शिकायतकर्ता | पूर्व क्यूरेटर शिव कुमार मिश्र |
| 📬 पत्र भेजा गया | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को |
| 👷 देरी की बताई वजह | विशेषज्ञ कर्मचारियों की कमी |
| ⏱️ काम दोबारा शुरू होने की संभावना | NRLC ने एक-दो महीने की उम्मीद जताई |
🔍 DarbhangaNews.in Analysis
सात वर्षों की देरी और अलग-अलग प्रगति आंकड़े परियोजना में पारदर्शिता की कमी दिखाते हैं। संग्रहालय और NRLC को वस्तुवार संयुक्त रिपोर्ट जारी कर पूरी हुई, अधूरी और लंबित कलाकृतियों की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
₹82.5 लाख अग्रिम भुगतान के बाद शाही पालकी और राजसिंहासन जैसी प्रमुख वस्तुओं का अधूरा रहना चिंता का विषय है। प्रधानमंत्री को पत्र भेजे जाने के बाद अब समयबद्ध कार्ययोजना और विशेषज्ञ टीम की तैनाती सबसे महत्वपूर्ण होगी।








