📍 महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा | DarbhangaNews.in
दरभंगा राज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी दुर्लभ हाथीदांत और लकड़ी की कलाकृतियों के संरक्षण को लेकर वर्षों से अटका काम आखिरकार फिर शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में शिकायत के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधान प्रयोगशाला (NRLC) के अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ दरभंगा पहुंच गए हैं। महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में रखी 155 ऐतिहासिक वस्तुओं के संरक्षण की यह परियोजना वर्ष 2019 में शुरू हुई थी, लेकिन बाद में इसकी रफ्तार लगभग थम गई थी।
इन दुर्लभ वस्तुओं में हाथीदांत की बेहद बारीक नक्काशी वाले सिंहासन, पालकी, हाथी का हौदा, शाही पलंग, श्रृंगार और आभूषण के बक्से, फर्नीचर और कई कलात्मक प्रतिमाएं शामिल हैं। लकड़ी की वस्तुओं में बुद्ध के जन्म से संबंधित विस्तृत दृश्य, मंदिरों की प्रतिकृतियां, दरबार हॉल की मेज, सोफा-कुर्सियां और पशु-पक्षियों की आकृतियां शामिल हैं। इनमें से अधिकांश वस्तुएं अब 100 वर्ष से अधिक पुरानी हैं।
📌 मुख्य बातें
✅ महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय की 155 धरोहरों का मामला
✅ हाथीदांत और लकड़ी की दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुएं शामिल
✅ मार्च 2019 में NRLC के साथ हुआ था समझौता
✅ संरक्षण परियोजना के लिए बिहार सरकार ने दिए ₹1.65 करोड़
✅ ₹82.5 लाख की राशि अग्रिम भुगतान की गई थी
✅ 2020 में शुरू हुआ था रासायनिक उपचार और संरक्षण
✅ करीब 100 छोटी वस्तुओं पर काम के बाद परियोजना लगभग रुक गई
✅ पूर्व संग्रहालयाध्यक्ष एसके मिश्रा ने PMO पोर्टल पर की शिकायत
✅ केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने 6 अगस्त को जांच और लंबित कार्य पूरा करने का निर्देश दिया
✅ अब NRLC की विशेषज्ञ टीम ने फिर शुरू किया संरक्षण
🏛️ 155 ऐतिहासिक वस्तुओं के संरक्षण की बनी थी योजना
महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संरक्षित इन धरोहरों को पूर्व दरभंगा राज परिवार ने बिहार सरकार को सौंपा था। इन्हीं वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए मार्च 2019 में तत्कालीन संग्रहालयाध्यक्ष शिव कुमार मिश्रा और NRLC के तत्कालीन महानिदेशक मैनेजर सिंह के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे।
समझौते के तहत NRLC को कुल 155 ऐतिहासिक वस्तुओं का तीन वर्षों के भीतर संरक्षण पूरा करना था। बिहार के संस्कृति विभाग के निर्देश पर परियोजना के लिए ₹1.65 करोड़ स्वीकृत किए गए। इसमें से आधी रकम यानी ₹82.5 लाख अग्रिम रूप से NRLC को दी गई थी।
इसके बाद विशेषज्ञ टीम ने वर्ष 2020 में कलाकृतियों का रासायनिक उपचार और संरक्षण कार्य शुरू किया।
⏳ करीब 100 छोटी वस्तुओं पर काम, फिर लगभग रुक गई परियोजना
शुरुआती चरण में NRLC की टीम ने करीब 100 छोटी कलाकृतियों पर संरक्षण कार्य किया। इसके बाद परियोजना की गति काफी धीमी हो गई और बड़े आकार की कई महत्वपूर्ण वस्तुएं उपचार की प्रतीक्षा में रह गईं।
रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के संस्कृति निदेशालय ने इस संबंध में कई बार पत्र भी भेजे, लेकिन परियोजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।
राज्य संस्कृति एवं पुरातत्व निदेशालय के निदेशक कृष्ण कुमार ने Hindustan Times को बताया कि उन्हें NRLC के अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के संरक्षण कार्य के लिए दरभंगा पहुंचने की जानकारी मिली है।
📩 पूर्व संग्रहालयाध्यक्ष ने PMO पोर्टल पर की शिकायत
लगातार देरी के बाद सेवानिवृत्त संग्रहालयाध्यक्ष एसके मिश्रा, जो INTACH की बिहार इकाई के सह-संयोजक भी हैं, ने जुलाई 2026 के अंतिम हिस्से में प्रधानमंत्री कार्यालय के शिकायत पोर्टल पर औपचारिक शिकायत दर्ज की। इसकी प्रति केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को भी भेजी गई।
शिकायत में संरक्षण कार्य की धीमी रफ्तार और बड़ी ऐतिहासिक वस्तुओं को नुकसान पहुंचने के बढ़ते खतरे का मुद्दा उठाया गया।
मिश्रा के अनुसार 100 से अधिक वस्तुओं का संरक्षण किया गया है, लेकिन इनमें अधिकांश आकार में छोटी हैं। उनका दावा है कि छह वर्षों में कुल परियोजना का वास्तविक काम केवल करीब 20 से 25 प्रतिशत ही पूरा हुआ है। यह प्रतिशत उनका आकलन है, न कि NRLC की सार्वजनिक आधिकारिक प्रगति रिपोर्ट।
📨 6 अगस्त को केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने दिया निर्देश
PMO में शिकायत के बाद मामले में तेजी आई। एसके मिश्रा के अनुसार केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने 6 अगस्त 2026 को NRLC, लखनऊ के महानिदेशक को पत्र भेजकर देरी और कथित लापरवाही की तत्काल जांच का निर्देश दिया।
मंत्रालय ने लंबित संरक्षण कार्य को बिना और देरी किए पूरा करने तथा कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट जमा करने को कहा है। मंत्रालय के निर्देश की प्रति शिकायतकर्ता को भी भेजी गई।
इसके बाद NRLC की टीम के दोबारा दरभंगा पहुंचने से वर्षों से लंबित परियोजना के अब आगे बढ़ने की उम्मीद बनी है।
🐘 देश के महत्वपूर्ण हाथीदांत संग्रहों में गिनी जाती हैं ये धरोहरें
दरभंगा संग्रहालय में रखी हाथीदांत की वस्तुओं को भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रहों में माना जाता है। Hindustan Times की रिपोर्ट में संग्रहालय के संग्रह को देश में हाथीदांत की कलाकृतियों के सबसे बड़े संग्रह के रूप में व्यापक रूप से वर्णित किया गया है।
इन वस्तुओं को दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह ने वर्ष 1900 से 1929 के बीच मुर्शिदाबाद के कुशल कारीगरों से बनवाया था।
आज ये कलाकृतियां केवल दरभंगा राज के इतिहास की निशानी नहीं हैं, बल्कि उस दौर की भारतीय शिल्पकला और कलाकारों की असाधारण क्षमता का भी प्रमाण हैं।
👑 महिषासुर मर्दिनी से शाही सिंहासन तक अनमोल संग्रह
हाथीदांत की प्रमुख कलाकृतियों में बेहद बारीकी से तैयार महिषासुर मर्दिनी की आकृति, हाथी का हौदा, पारंपरिक पालकी, शाही पलंग, सिंहासन और घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी महाराज की आकृति शामिल हैं।
इसके अलावा सोफा, टेबल, कुर्सियां, श्रृंगार सामग्री, आभूषण रखने के बक्से और चार हाथियों के सिरों का विशेष कलात्मक समूह भी संग्रह का हिस्सा है।
संग्रह की कई वस्तुओं में इतनी महीन नक्काशी है कि इतिहास और कला से जुड़े विशेषज्ञ लंबे समय से इसे विशिष्ट संग्रह मानते आए हैं।
🪵 लकड़ी की धरोहरें भी कम महत्वपूर्ण नहीं
संग्रहालय में केवल हाथीदांत की ही नहीं बल्कि लकड़ी की बड़ी संख्या में दुर्लभ कलाकृतियां भी संरक्षित हैं।
इनमें भगवान बुद्ध के जन्म का विस्तृत दृश्य, मंदिरों की वास्तु प्रतिकृतियां, धातु जड़ाई वाले सोफा और कुर्सियां, अलग-अलग आकार की मेजें, दरबार हॉल की मेज और भोजन की बड़ी मेज शामिल हैं।
लकड़ी से बने हाथी, शेर, मगरमच्छ, मछली और कछुए जैसी आकृतियां भी संग्रह में हैं। इसके अतिरिक्त देश-विदेश से दरभंगा राज परिवार को उपहार में मिली कई अन्य वस्तुएं भी संरक्षित हैं।
⚠️ 100 साल से ज्यादा पुरानी वस्तुओं पर समय का असर
इनमें से अधिकांश वस्तुएं एक सदी से अधिक पुरानी हो चुकी हैं। रिपोर्ट के अनुसार नियंत्रित वातावरण और नियमित वैज्ञानिक संरक्षण के अभाव में कुछ वस्तुओं के खराब होने की प्रक्रिया तेज हुई है।
विशेष रूप से हाथीदांत और पुरानी लकड़ी तापमान, नमी, धूल, कीट और वातावरण में बदलाव के प्रति संवेदनशील होती है। इसलिए केवल एक बार रासायनिक उपचार कर देना पर्याप्त नहीं होता; संग्रहालय स्तर पर लगातार उचित संरक्षण व्यवस्था भी जरूरी होती है।
Hindustan Times के मुताबिक मिश्रा ने शिकायत में विशेष चिंता उन बड़ी कलाकृतियों को लेकर जताई थी, जिनका संरक्षण अभी बाकी है और जिनमें देखभाल के अभाव में क्षरण शुरू होने की बात कही गई है।
🏰 दरभंगा राज परिवार ने सरकार को दिया था पूरा संग्रह
इन दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह कभी दरभंगा राज परिवार की शाही संपदा का हिस्सा था। बाद में राज परिवार ने इन्हें बिहार सरकार को संग्रहालय स्थापित करने के लिए दान कर दिया। आज यही संग्रह महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय की सबसे महत्वपूर्ण पहचान में शामिल है।
इस कारण इन वस्तुओं का संरक्षण किसी सामान्य संग्रहालय मरम्मत का मामला नहीं है। इनके साथ दरभंगा राज, मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और 20वीं सदी के शुरुआती दौर की भारतीय कला का इतिहास जुड़ा है।
🔬 अब बड़े और संवेदनशील नमूनों पर रहेगी नजर
NRLC विशेषज्ञों के लौटने के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उन बड़े नमूनों का संरक्षण कितनी तेजी और वैज्ञानिक तरीके से होता है, जिन्हें अभी तक पूरा उपचार नहीं मिला है।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने लंबित काम जल्द पूरा करने और अनुपालन रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। इससे परियोजना पर अब प्रशासनिक निगरानी बढ़ने की उम्मीद है।
हालांकि नई समय सीमा क्या होगी, NRLC कितने विशेषज्ञों की टीम लगाएगा और शेष कार्य किस तारीख तक पूरा होगा—इनका विवरण Hindustan Times की रिपोर्ट में नहीं दिया गया है।
📊 जरूरी जानकारी एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| संग्रहालय | महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय |
| स्थान | दरभंगा |
| संरक्षण के लिए चयनित वस्तुएं | 155 |
| प्रमुख सामग्री | हाथीदांत और लकड़ी |
| समझौता | मार्च 2019 |
| संरक्षण एजेंसी | NRLC, केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय |
| परियोजना अवधि | तीन वर्ष निर्धारित थी |
| स्वीकृत राशि | ₹1.65 करोड़ |
| अग्रिम भुगतान | ₹82.5 लाख |
| काम शुरू | 2020 |
| अब तक उपचारित | लगभग 100 छोटी वस्तुएं |
| कुल प्रगति का दावा | लगभग 20-25%, एसके मिश्रा के अनुसार |
| शिकायत | PMO पोर्टल पर |
| मंत्रालय का निर्देश | 6 अगस्त 2026 |
| मौजूदा स्थिति | संरक्षण कार्य फिर शुरू |
🔍 DarbhangaNews.in विश्लेषण
दरभंगा की इन धरोहरों का मामला यह दिखाता है कि केवल बजट स्वीकृत करना और एजेंसी नियुक्त करना पर्याप्त नहीं है। मार्च 2019 में तीन वर्ष के भीतर 155 वस्तुओं का संरक्षण पूरा करने का समझौता हुआ था, लेकिन सात वर्ष बाद भी बड़े और सबसे महत्वपूर्ण नमूनों का काम बाकी रहना गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है।
अब PMO में शिकायत और केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के निर्देश के बाद परियोजना दोबारा शुरू हुई है, तो इसकी प्रगति सार्वजनिक रूप से दर्ज की जानी चाहिए। कितनी वस्तुएं पूरी तरह सुरक्षित की गईं, कितनी अभी उपचाराधीन हैं और किन नमूनों को तत्काल संरक्षण की जरूरत है—इसकी स्पष्ट सूची उपलब्ध कराना उचित होगा।
₹1.65 करोड़ की इस परियोजना में ₹82.5 लाख अग्रिम भुगतान होने के बावजूद वर्षों की देरी के कारणों की भी जांच जरूरी है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इस संबंध में तत्काल जांच का निर्देश दिया है, इसलिए अनुपालन रिपोर्ट से देरी की जिम्मेदारी अधिक स्पष्ट हो सकती है।
दरभंगा राज की ये वस्तुएं दोबारा बनाई नहीं जा सकतीं। किसी ऐतिहासिक सिंहासन, हाथीदांत की नक्काशी या सौ वर्ष पुराने लकड़ी के नमूने को स्थायी नुकसान होने के बाद बजट से उसकी मूल ऐतिहासिकता वापस नहीं लाई जा सकती। इसलिए शेष संरक्षण कार्य को समयबद्ध तरीके से पूरा करना और संग्रहालय में दीर्घकालिक वैज्ञानिक संरक्षण व्यवस्था बनाना सबसे महत्वपूर्ण होगा।








