मैथिली सिनेमा की ‘नई दरभंगा लहर’ पहुंची न्यूयॉर्क, अपने ही इलाके में पर्दे के लिए संघर्ष

मैथिली सिनेमा की ‘नई दरभंगा लहर’ पहुंची न्यूयॉर्क, अपने ही इलाके में पर्दे के लिए संघर्ष
WhatsAppTelegramLinkedIn

📍 दरभंगा, बिहार | DarbhangaNews.in

दरभंगा की गलियों, पुराने घरों, स्थानीय कलाकारों और मिथिला के रोजमर्रा के जीवन से निकली कहानियां अब अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंच रही हैं। ‘गमक घर’, ‘धुइन’, ‘पोखर के दुनू पार’ और ‘टॉर्टॉइज अंडर द अर्थ’ जैसी फिल्मों के जरिए उभरे फिल्मकारों के इस दौर को अब ‘नई दरभंगा लहर’ कहा जा रहा है। इन फिल्मों को देश-विदेश के फिल्म समारोहों और दर्शकों से सराहना मिली है, लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल आज भी वही है—अपनी फिल्मों को बिहार और मिथिला के दर्शकों तक सिनेमाघरों में पहुंचाना।

ThePrint की 9 अगस्त 2026 की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार इस नई धारा के केंद्र में अचल मिश्रा, पार्थ सौरभ और अभिनेता-लेखक अभिनव झा जैसे युवा नाम हैं। इनका उद्देश्य बड़े बजट और चमक-दमक की नकल करने के बजाय अपने आसपास के समाज, भाषा और जीवन को उसी रूप में पर्दे पर उतारना रहा है।

📌 मुख्य बातें

✅ दरभंगा से उभरी मैथिली फिल्मों की नई पीढ़ी को मिला ‘नई दरभंगा लहर’ नाम
✅ ‘गमक घर’ से 2019 में इस नए दौर को गति मिली
✅ ‘धुइन’, ‘पोखर के दुनू पार’ और दूसरी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय पहचान
✅ कई स्थानीय रंगकर्मी फिल्मों में निभा रहे प्रमुख भूमिकाएं
✅ दरभंगा की वास्तविक गलियों और घरों में होती है शूटिंग
✅ फिल्म समारोहों तक पहुंचने के बावजूद स्थानीय सिनेमाघरों में पर्दा मिलना कठिन
✅ छोटी फिल्म की रिलीज पर निर्माण से अधिक खर्च होने की समस्या
✅ एकल पर्दे वाले पुराने सिनेमाघरों के बंद होने से चुनौती और बढ़ी
✅ बिहार की सहायता नीति पर फिल्मकारों ने समय को लेकर सवाल उठाए
✅ नई फिल्मों की शूटिंग दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर तक फैली

🎬 2019 में ‘गमक घर’ से तेज हुई नई शुरुआत

ThePrint के अनुसार ‘नई दरभंगा लहर’ की शुरुआत 2019 के आसपास मानी जाती है, जब अचल मिश्रा की लिखी और निर्देशित फिल्म ‘गमक घर’ सामने आई। इस फिल्म में अभिनव झा मुख्य भूमिका में थे। फिल्म एक पुराने पुश्तैनी घर, परिवार और बदलते समय के रिश्ते को बहुत साधारण लेकिन गहरे तरीके से दिखाती है।

अभिनव झा के मुताबिक उस समय टीम के मन में किसी दूसरी फिल्म परंपरा के खिलाफ विद्रोह करने का विचार नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य ईमानदार और अपने परिवेश से जुड़ी फिल्म बनाना था। बाद में इन्हीं कोशिशों को क्षेत्रीय सिनेमा के नए दौर के रूप में देखा जाने लगा।

🎭 ‘धुइन’ में दरभंगा के रंगमंच और असली जिंदगी की झलक

अचल मिश्रा की दूसरी चर्चित फिल्म ‘धुइन’ 2022 में आई। इसे पार्थ सौरभ ने लिखा और अभिनव झा ने मुख्य भूमिका निभाई। कहानी एक संघर्षरत रंगकर्मी के जीवन से प्रेरित थी, जो अभिनय का सपना देखता है लेकिन रोजगार और परिवार की वास्तविकताओं से जूझ रहा है।

इस फिल्म की खासियत यह थी कि कई हिस्सों में वास्तविक जीवन और अभिनय के बीच की दूरी बहुत कम रखी गई। जिस रंगकर्मी की जिंदगी ने कहानी को प्रेरित किया, उसके वास्तविक घर में भी शूटिंग हुई। पेशेवर कलाकारों के साथ स्थानीय रंगमंच से जुड़े लोगों को भी फिल्म में शामिल किया गया।

यही स्थानीय जुड़ाव इस नई फिल्म धारा की सबसे बड़ी पहचान बनता दिखाई देता है।

🌊 ‘पोखर के दुनू पार’ ने भी बनाई अलग पहचान

पार्थ सौरभ की पहली निर्देशित फिल्म ‘पोखर के दुनू पार’ भी इस नई धारा की महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है। इसका निर्माण अचल मिश्रा ने किया और अभिनव झा ने प्रमुख भूमिका निभाई। कहानी एक ऐसे प्रेमी जोड़े के आसपास घूमती है जो घर से भागने के बाद आर्थिक संकट के कारण वापस अपने शहर लौटता है।

पार्थ सौरभ ने ThePrint से कहा कि दरभंगा में बड़े होने का प्रभाव स्वाभाविक रूप से उनकी कहानियों पर पड़ा। उनका प्रयास शहर और यहां के लोगों को उसी नजर से दर्ज करने का है, जिस नजर से यहां रहने वाले लोग अपने समाज को देखते हैं।

🌍 न्यूयॉर्क तक पहुंचीं फिल्में, लेकिन घर में दर्शक तक पहुंचना कठिन

नई दरभंगा लहर की फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। ‘गमक घर’, ‘धुइन’ और ‘टॉर्टॉइज अंडर द अर्थ’ कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंचीं और समीक्षकों की सराहना हासिल की। पार्थ सौरभ की फिल्मों को न्यूयॉर्क इंडिया फिल्म फेस्टिवल समेत दूसरे समारोहों में भी दिखाया गया।

विडंबना यह है कि विदेश के समारोहों तक पहुंचने के बाद भी इन फिल्मों के लिए मिथिला और बिहार के आम दर्शकों तक पहुंचना आसान नहीं है। फिल्मकारों के अनुसार असली चुनौती फिल्म बनाने से ज्यादा उसके वितरण और सिनेमाघर में प्रदर्शन की है।

💸 ₹15 लाख की फिल्म, रिलीज पर ₹30 लाख खर्च का संकट

पार्थ सौरभ ने वितरण की समस्या समझाते हुए ThePrint को बताया कि छोटी स्वतंत्र फिल्म का सिनेमाघरों में प्रदर्शन कई बार उसके निर्माण से भी महंगा पड़ सकता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि कोई फिल्म लगभग ₹15 लाख में बनी हो और उसकी रिलीज पर करीब ₹30 लाख खर्च करना पड़े, तो छोटे फिल्मकार के लिए यह आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रहता।

बड़े बजट की फिल्मों के पास प्रचार, वितरक और बड़ी संख्या में पर्दे हासिल करने के लिए अधिक संसाधन होते हैं। वहीं छोटी क्षेत्रीय फिल्म यदि उसी समय किसी बड़े हिंदी सिनेमा के साथ रिलीज हो तो उसे सिनेमाघर में शो मिलना और मुश्किल हो जाता है।

🏚️ पुराने एकल सिनेमाघरों का बंद होना भी बनी बड़ी समस्या

रिपोर्ट में फिल्मकारों ने एक और समस्या बताई है—पुराने एकल पर्दे वाले सिनेमाघरों का लगातार बंद होना। पहले छोटे शहरों में अपेक्षाकृत कम खर्च में क्षेत्रीय फिल्म दिखाने की संभावना रहती थी, लेकिन अब अधिकतर नए सिनेमाघर बड़े व्यावसायिक ढांचे के अनुसार काम करते हैं।

इसके कारण कम बजट की मैथिली फिल्म के लिए अपने ही क्षेत्र में पर्याप्त शो हासिल करना कठिन हो जाता है। यदि स्थानीय दर्शक फिल्म देख ही नहीं पाएंगे तो केवल समारोहों में पुरस्कार और प्रशंसा से आर्थिक रूप से स्थायी फिल्म उद्योग बनाना मुश्किल रहेगा।

🏛️ सरकारी सहायता है, लेकिन फिल्मकारों की अलग परेशानी

बिहार सरकार ने क्षेत्रीय फिल्मों के लिए आर्थिक सहायता की नीति बनाई है। लेकिन पार्थ सौरभ ने ThePrint से कहा कि सहायता फिल्म बनने और रिलीज होने के बाद मिलती है, जबकि स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए सबसे बड़ी समस्या फिल्म बनाने से पहले पैसा जुटाने की होती है।

बिहार की फिल्म नीति के तहत राज्य में पर्याप्त हिस्से की शूटिंग करने वाली फिल्मों के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। राज्य में दरभंगा समेत कई जिलों में फिल्मों की शूटिंग को बढ़ावा देने की कोशिश भी चल रही है।

फिल्मकारों का तर्क है कि निर्माण के शुरुआती चरण में आर्थिक मदद, स्थानीय वितरण और छोटे सिनेमाघरों तक पहुंच की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

🎭 स्थानीय रंगमंच के कलाकार बने नई फिल्मों की ताकत

नई दरभंगा लहर के फिल्मकार लगातार स्थानीय रंगमंच समूहों से कलाकार चुन रहे हैं। पार्थ सौरभ के अनुसार इसका दोहरा फायदा है—स्थानीय कलाकारों को बड़े पर्दे पर काम का अवसर मिलता है और फिल्मकारों को ऐसे अभिनेता मिलते हैं जो क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और व्यवहार को पहले से समझते हैं।

इससे संवाद बोलने से लेकर शरीर की भाषा और स्थानीय जीवन की छोटी-छोटी बातों तक फिल्म में अधिक स्वाभाविकता दिखाई देती है।

दरभंगा की मजबूत रंगमंच परंपरा इस नई फिल्म धारा के लिए कलाकारों की एक स्वाभाविक पाठशाला बन रही है।

🎥 दरभंगा-मधुबनी-समस्तीपुर में बनी अगली फिल्म ‘बजरंगी’

पार्थ सौरभ अब अपनी अगली फिल्म ‘बजरंगी’ पर काम कर रहे हैं, जिसमें अभिनव झा फिर प्रमुख भूमिका में हैं। कहानी एक गांव के मुखिया के लिए काम करने वाले दबंग व्यक्ति के जीवन पर केंद्रित है।

फिल्म की शूटिंग दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर में तीन अलग-अलग मौसमों—गर्मी, बरसात और सर्दी—में की गई है। इसका उद्देश्य मुख्य पात्र के जीवन के पूरे एक वर्ष को बदलते मौसम के साथ दिखाना है।

यह भी दिखाता है कि नई पीढ़ी मिथिला के वास्तविक भूगोल को केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

🎞️ मैथिली सिनेमा का सफर ‘कन्यादान’ से नई पीढ़ी तक

मैथिली सिनेमा का इतिहास नया नहीं है। ThePrint ने 1965 में आई फणी मजूमदार की ‘कन्यादान’ को मैथिली भाषा की शुरुआती महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना है। यह हरिमोहन झा के उपन्यास पर आधारित थी। इसके बावजूद लंबे समय तक मैथिली फिल्मों का नियमित निर्माण नहीं हो पाया।

बाद के वर्षों में नितिन चंद्रा की ‘मिथिला मखान’ ने मैथिली सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी और यह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली पहली मैथिली फीचर फिल्म बनी। उन्होंने बाद में ‘जैक्सन हॉल्ट’ भी बनाई और क्षेत्रीय फिल्मों के लिए अलग मंच विकसित करने की कोशिश की।

लेकिन 2019 के बाद दरभंगा से निकली युवा पीढ़ी ने इस धारा को लगातार फिल्मों और आपसी सहयोग के जरिए आगे बढ़ाया।

🎬 ‘ललका पाग’ ने भी पहले तैयार की थी जमीन

इस नए दौर से पहले प्रशांत नागेंद्र ने भी मैथिली सिनेमा को दोबारा जीवित करने की कोशिश की थी। अपनी अच्छी-खासी बैंकिंग नौकरी छोड़कर वह बिहार लौटे और 2015 में ‘ललका पाग’ बनाई, जो राजकमल चौधरी की कहानी पर आधारित थी।

हालांकि फिल्म को व्यापक सिनेमाघर प्रदर्शन नहीं मिला। फिल्मकार प्रकाश झा की मदद से इसे पटना के सिनेपोलिस में करीब एक सप्ताह तक दिखाया गया था। इसके बाद भी स्वतंत्र मैथिली सिनेमा के लिए आर्थिक स्थिरता की समस्या बनी रही।

प्रशांत नागेंद्र बाद में फिर वित्त क्षेत्र की नौकरी में लौट गए। उनका अनुभव इस बात का उदाहरण है कि केवल अच्छी फिल्म बना लेना छोटे क्षेत्रीय फिल्मकार के लिए टिके रहने की गारंटी नहीं है।

📊 जरूरी जानकारी एक नजर में

विवरणजानकारी
फिल्म आंदोलननई दरभंगा लहर
प्रमुख भाषामैथिली
प्रमुख केंद्रदरभंगा और मिथिला
नई लहर की शुरुआतलगभग 2019
प्रमुख फिल्मकारअचल मिश्रा, पार्थ सौरभ
प्रमुख अभिनेता-लेखकअभिनव झा
प्रमुख फिल्मगमक घर
अन्य चर्चित फिल्मेंधुइन, पोखर के दुनू पार, टॉर्टॉइज अंडर द अर्थ
अंतरराष्ट्रीय पहुंचन्यूयॉर्क समेत कई फिल्म समारोह
मुख्य चुनौतीफिल्मों का वितरण और सिनेमाघरों में पर्दा
दूसरी चुनौतीनिर्माण के लिए शुरुआती धन
स्थानीय ताकतरंगमंच कलाकार और वास्तविक स्थान
नई फिल्मबजरंगी
शूटिंग क्षेत्रदरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर

🔍 DarbhangaNews.in विश्लेषण

‘नई दरभंगा लहर’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि कुछ फिल्में विदेशों के समारोहों तक पहुंच गईं। असली बदलाव यह है कि दरभंगा और मिथिला के युवा फिल्मकार अब अपनी भाषा, अपने शहर और अपने लोगों को किसी बाहरी नजर से नहीं, बल्कि अपनी नजर से बड़े पर्दे पर दर्ज कर रहे हैं।

लेकिन यदि ये फिल्में न्यूयॉर्क में दिखाई जाएं और दरभंगा के आम दर्शक इन्हें अपने शहर के सिनेमाघर में न देख पाएं तो क्षेत्रीय सिनेमा का सबसे महत्वपूर्ण संबंध अधूरा रह जाता है। इसीलिए वितरण का संकट केवल व्यापारिक समस्या नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति की पहुंच का भी सवाल है।

बिहार सरकार की फिल्म नीति को निर्माण सहायता के साथ स्थानीय प्रदर्शन व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। दरभंगा, मधुबनी और दूसरे शहरों में क्षेत्रीय फिल्मों के लिए निश्चित शो, छोटे प्रदर्शन केंद्र या कम लागत वाले पर्दे उपलब्ध हों तो स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए अपने दर्शक तक पहुंचना आसान हो सकता है।

दरभंगा में रंगमंच, कलाकार, लेखक, स्थानीय कहानियां और अब लगातार फिल्म बनाने वाली नई पीढ़ी मौजूद है। यदि इसके साथ पैसा, प्रदर्शन और वितरण का मजबूत ढांचा जुड़ जाए तो ‘नई दरभंगा लहर’ केवल फिल्म समारोहों की पहचान न रहकर एक स्थायी मैथिली फिल्म उद्योग की शुरुआत बन सकती है।

आपकी प्रतिक्रिया:

दरभंगा की ताजा खबरें

अभी पढ़ें

टिप्पणी करें

आपका ईमेल प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं।