‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के झांसे में गंवाए ₹35.74 लाख पूरे वापस, साइबर पुलिस की कार्रवाई से 73 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मी को बड़ी राहत

‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के झांसे में गंवाए ₹35.74 लाख पूरे वापस, साइबर पुलिस की कार्रवाई से 73 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मी को बड़ी राहत
WhatsAppTelegramLinkedIn

📍 दरभंगा | DarbhangaNews.in

दरभंगा में तथाकथित ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के नाम पर ठगी का शिकार हुए 73 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को बड़ी राहत मिली है। साइबर अपराधियों ने उन्हें पुलिस और बैंक अधिकारी बनकर डराया और जांच के नाम पर ₹35 लाख 74 हजार दूसरे खाते में भेजवा लिए। शिकायत के बाद दरभंगा साइबर थाना पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की, रकम को रुकवाया और न्यायालयी प्रक्रिया पूरी होने के बाद पीड़ित की पूरी राशि वापस उनके खाते में पहुंच गई।

पीड़ित की पहचान दरभंगा के लक्ष्मीसागर-गंगवाड़ा इलाके के रहने वाले राम बहादुर कामत के रूप में हुई है। रिपोर्ट के अनुसार उनके पास फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को मुंबई साइबर अपराध शाखा का अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के आधार कार्ड का इस्तेमाल कर एक फर्जी बैंक खाता खोला गया है और उसमें संदिग्ध लेन-देन हुआ है। इसी कथित जांच का डर दिखाकर उन्हें अपने जाल में फंसाया गया।

इसके बाद एक दूसरे व्यक्ति ने कथित बैंक अधिकारी बनकर उनसे संपर्क किया और खाते में मौजूद ₹35.74 लाख को ‘जांच’ के लिए दूसरे बैंक खाते में भेजने को कहा। भरोसा दिलाया गया कि जांच पूरी होने के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा। पीड़ित ने ठगों की बात पर विश्वास कर अपनी जमा पूंजी स्थानांतरित कर दी, लेकिन एक सप्ताह बीतने के बाद भी रकम वापस नहीं आई तो उन्हें ठगी का अहसास हुआ।

📌 मुख्य बातें

✅ पीड़ित 73 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी राम बहादुर कामत हैं।

✅ साइबर अपराधियों ने खुद को मुंबई साइबर अपराध अधिकारी और बैंक अधिकारी बताकर संपर्क किया।

✅ पीड़ित को आधार कार्ड के नाम पर कथित फर्जी खाते और संदिग्ध लेन-देन का डर दिखाया गया।

✅ जांच के नाम पर उनसे ₹35 लाख 74 हजार स्थानांतरित करा लिए गए।

✅ पैसा एक सप्ताह में वापस मिलने का भरोसा दिया गया था, लेकिन रकम नहीं लौटी।

✅ पीड़ित ने 12 फरवरी 2026 को दरभंगा साइबर थाना में शिकायत दर्ज कराई।

✅ साइबर थाना पुलिस ने तत्काल राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 के माध्यम से रकम रुकवाने की प्रक्रिया शुरू कराई।

✅ जांच में रकम भुवनेश्वर स्थित येस बैंक के एक खाते में पहुंचने की जानकारी सामने आई।

✅ न्यायालय से आवश्यक आदेश मिलने के बाद पूरी ₹35.74 लाख की राशि पीड़ित के खाते में वापस कराई गई।

✅ पुलिस के अनुसार जिले में इतनी बड़ी साइबर ठगी की पूरी रकम वापस कराने का यह उल्लेखनीय मामला है।

📞 मुंबई का साइबर अधिकारी बनकर आया फोन

घटना की शुरुआत एक फोन कॉल से हुई। रिपोर्ट के अनुसार कॉल करने वाले ने खुद को मुंबई साइबर अपराध विभाग का अधिकारी बताया।

उसने राम बहादुर कामत से कहा कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल करके एक बैंक खाता खोला गया है और उस खाते से गलत आर्थिक लेन-देन हुआ है। ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसी, बैंक या अन्य सरकारी संस्था का नाम लेकर पीड़ित के मन में गिरफ्तारी का डर पैदा करते हैं।

केंद्र सरकार भी बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ में रखने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। सीबीआई ने भी मई 2026 में कहा था कि ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ नाम की कोई कानूनी व्यवस्था भारत में मौजूद नहीं है।

🏦 बैंक अधिकारी बनकर दिया रकम भेजने का निर्देश

पहला फोन आने के बाद ठगी का दूसरा चरण शुरू हुआ।

रिपोर्ट के अनुसार एक अन्य व्यक्ति ने खुद को बैंक अधिकारी बताते हुए राम बहादुर कामत से संपर्क किया। उसने दावा किया कि उनके खाते में मौजूद ₹35 लाख 74 हजार की जांच जरूरी है और इसके लिए पूरी राशि बताए गए दूसरे खाते में भेजनी होगी।

ठग ने भरोसा दिलाया कि रकम केवल जांच के लिए ली जा रही है और करीब एक सप्ताह बाद वापस उनके मूल खाते में भेज दी जाएगी।

सरकारी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाए जाने के कारण पीड़ित ने कथित निर्देशों का पालन कर दिया और अपनी पूरी जमा राशि स्थानांतरित कर दी।

💰 एक सप्ताह बाद भी पैसा नहीं लौटा तो हुआ ठगी का अहसास

राम बहादुर कामत को बताया गया था कि जांच पूरी होने के बाद रकम उनके खाते में लौट जाएगी।

लेकिन एक सप्ताह गुजरने के बावजूद जब पैसा वापस नहीं आया तो उन्हें संदेह हुआ। इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीड़ित ने पुलिस से संपर्क किया और बैंकिंग लेन-देन को रोकने की प्रक्रिया शुरू हो सकी।

👮 12 फरवरी को साइबर थाने में दर्ज कराया मामला

रिपोर्ट के मुताबिक राम बहादुर कामत ने 12 फरवरी 2026 को दरभंगा साइबर थाना में शिकायत दर्ज कराई। मामला साइबर थाना कांड संख्या 14/2026 के रूप में दर्ज किए जाने की जानकारी है।

मामले की जांच साइबर थाना के निरीक्षक रंजीत शर्मा को दी गई।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने सबसे पहले रकम को आगे दूसरे खातों में जाने से रोकने की कोशिश की। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 की व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया।

केंद्र सरकार का राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल भी स्पष्ट करता है कि आर्थिक साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में तुरंत 1930 पर सूचना दी जा सकती है।

⏱️ समय पर शिकायत ने बचाई पूरी रकम

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रकम को समय रहते रोकना रही।

पुलिस की कार्रवाई के बाद पूरी ठगी की राशि पर रोक लगाई जा सकी। जांच में पता चला कि पैसा ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित येस बैंक के एक खाते में पहुंचा था। रिपोर्ट में इसे एक संस्था से जुड़ा खाता बताया गया है।

पुलिस ने रकम के बैंकिंग रास्ते की जांच शुरू की। अनुसंधानकर्ता को पहले मुंबई और बाद में भुवनेश्वर भेजे जाने की भी जानकारी सामने आई है।

इसके बाद रकम वापस कराने के लिए न्यायालयी प्रक्रिया अपनाई गई।

⚖️ न्यायालय के आदेश के बाद वापस मिले ₹35.74 लाख

किसी साइबर ठगी के बैंक खाते में रकम रोक दिए जाने का अर्थ यह नहीं होता कि वह तत्काल पीड़ित के खाते में वापस आ जाएगी।

रकम की पहचान, संबंधित बैंक से पुष्टि और जरूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही उसे मूल पीड़ित को लौटाया जा सकता है।

दरभंगा पुलिस ने भी इस मामले में यही प्रक्रिया अपनाई। रिपोर्ट के अनुसार न्यायालय से आदेश मिलने के बाद पूरे ₹35 लाख 74 हजार राम बहादुर कामत के खाते में वापस भेज दिए गए।

अनुसंधानकर्ता ने यह भी बताया कि पीड़ित ने लिखित रूप से पूरी रकम वापस मिलने की पुष्टि की है।

👴 पीड़ित ने सार्वजनिक रूप से सामने आने से किया परहेज

राम बहादुर कामत ने मीडिया के सामने आने से परहेज किया। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की।

साइबर अपराध के पीड़ितों की पहचान और निजी बैंकिंग जानकारी के मामले में गोपनीयता महत्वपूर्ण होती है। इसलिए ऐसी घटनाओं में खाता संख्या, मोबाइल नंबर, आधार संख्या या अन्य संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए।

👮 दरभंगा के वर्तमान एसएसपी जगुनाथ रड्डी

दरभंगा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वर्तमान में जगुनाथ रड्डी दरभंगा के वरीय पुलिस अधीक्षक हैं। जिला प्रशासन की सूची जुलाई 2026 में अद्यतन की गई थी।

इस साइबर मामले में भी वरीय पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर जांच को आगे बढ़ाने की बात स्थानीय रिपोर्ट में कही गई है।

🚨 ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ वास्तव में क्या है?

‘डिजिटल गिरफ्तारी’ कोई वास्तविक कानूनी कार्रवाई नहीं है।

इस तरह की ठगी में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स विभाग, बैंक या अन्य सरकारी संस्था का अधिकारी बताते हैं। इसके बाद पीड़ित को किसी बड़े अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी बैंक खाते या संदिग्ध पार्सल से जोड़कर डराया जाता है।

कई मामलों में वीडियो कॉल पर नकली पुलिस वर्दी, फर्जी कार्यालय, नकली गिरफ्तारी वारंट और कथित अदालत के आदेश तक दिखाए जाते हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय और सीबीआई दोनों ने लोगों को ऐसी कॉल से नहीं डरने की सलाह दी है। सरकारी एजेंसियां जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर बंदी बनाकर बैंक खाते से पैसा दूसरे खाते में भेजने का निर्देश नहीं देतीं।

☎️ ठगी होते ही 1930 पर सूचना क्यों जरूरी?

दरभंगा का यह मामला इस बात का उदाहरण है कि आर्थिक साइबर ठगी में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है।

जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होती है, रकम को बैंकिंग व्यवस्था में रोक पाने की संभावना उतनी बढ़ सकती है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार साइबर आर्थिक धोखाधड़ी की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए बनाई गई व्यवस्था के माध्यम से 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से ज्यादा की राशि बचाई गई थी।

अगर किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन आर्थिक धोखाधड़ी हो जाए तो उसे तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करना चाहिए और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।

⚠️ इन बातों को हमेशा याद रखें

पुलिस, सीबीआई या कोई सरकारी एजेंसी फोन पर यह नहीं कहती कि जांच साबित करने के लिए अपनी पूरी जमा पूंजी किसी दूसरे खाते में भेज दें।

किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा बैंक खाता ‘सत्यापित’ करने के नाम पर पैसे मांगे जाएं तो कोई राशि स्थानांतरित न करें।

आधार कार्ड, बैंक विवरण, एकबारगी पासवर्ड या अन्य गोपनीय जानकारी फोन पर साझा न करें।

अगर कोई व्यक्ति पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर गिरफ्तारी का डर दिखाए तो फोन काटकर संबंधित विभाग के आधिकारिक नंबर से स्वयं पुष्टि करें।

और यदि पैसे स्थानांतरित हो चुके हों तो समय गंवाए बिना 1930 पर सूचना दें।

📊 जरूरी जानकारी एक नजर में

विवरणजानकारी
पीड़ितराम बहादुर कामत
उम्र73 वर्ष
पेशासेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी
क्षेत्रलक्ष्मीसागर-गंगवाड़ा, दरभंगा
ठगी का तरीकाकथित ‘डिजिटल गिरफ्तारी’
ठगी की राशि₹35 लाख 74 हजार
आरोपियों ने पहचान बताईमुंबई साइबर अधिकारी और बैंक अधिकारी
शिकायत की तारीख12 फरवरी 2026
साइबर थाना कांड संख्यारिपोर्ट के अनुसार 14/2026
अनुसंधानकर्तानिरीक्षक रंजीत शर्मा
रकम पहुंचने का स्थानरिपोर्ट के अनुसार भुवनेश्वर स्थित येस बैंक खाता
पुलिस की शुरुआती कार्रवाईरकम पर रोक
अंतिम परिणामपूरी ₹35.74 लाख राशि वापस
शिकायत हेल्पलाइन1930

🔍 DarbhangaNews.in विश्लेषण

दरभंगा साइबर पुलिस की इस कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ठगी की पूरी रकम वापस मिलना है। आमतौर पर साइबर अपराधी पैसा प्राप्त होते ही उसे कई खातों के बीच तेजी से घुमाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में रकम आगे निकल जाने से पहले उसे रोकना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस मामले में ₹35.74 लाख जैसी बड़ी रकम का पूरा वापस मिलना यह भी दिखाता है कि पीड़ित की शिकायत, पुलिस की तत्काल कार्रवाई, बैंकिंग व्यवस्था और न्यायालयी प्रक्रिया सही समय पर एक साथ काम करें तो साइबर ठगी में आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है।

लेकिन इस घटना का दूसरा पक्ष और भी महत्वपूर्ण है। एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग को आधार कार्ड और आपराधिक मामले का डर दिखाकर उसकी पूरी जमा पूंजी स्थानांतरित कराना बताता है कि साइबर अपराधी तकनीक से ज्यादा डर और विश्वास का इस्तेमाल कर रहे हैं।

दरभंगा में इस सफलता को केवल पुलिस की रकम वापसी के रूप में नहीं, बल्कि लोगों के लिए चेतावनी के रूप में भी देखा जाना चाहिए—फोन पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर अगर कोई पैसा मांगता है तो वहीं रुकना, सत्यापन करना और तुरंत पुलिस को सूचना देना जरूरी है।

आपकी प्रतिक्रिया:

दरभंगा की ताजा खबरें

अभी पढ़ें

टिप्पणी करें

आपका ईमेल प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं।